प्यारे दोस्तों एवं (जो हमे दुश्मन मानता है )
मैं ये पोस्ट आप सब से कुछ बतीन बताने के लिए लिख रहा हूँ। हिन्दी में लिखने की एक वजह है, वो ये की मई ये बातें एक हिन्दुस्तानी नागरिक से ही बंटाना चाहता हूँ।
आप सभी जब पैदा होते हैं, तो आप के घर में भावनाएं उत्सर्जित होती हैं। कईयों के घर में खुसी और बहुत कम के घरों में दुःख का आलम होता है। जो भी हो, आप जनम तो ले चुके हैं। रिश्ते बनना शुरू हो जाते हैं, उस वक्त से जब आपका जनम होता है तभी से। बेहर्हर चोटी उमर में सायद ये समाज में नही अत है, पर जैसे जैसे हम बड़े होने लगते हैं, समाज को, घर को, दोस्तों को और अन्य सभी लोगों से मिलते हैं, हम सबसे किसी न किसी रूप से एक रिश्ता बनते कहते जाते हैं। हम कुछ अजीवित चीजों से भी रिश्तें बना लेते हैं, जैसे टीवी, फ़ोन आदि।
हम इन सभी चीजों से (जीवित और मृत) से कुछ इस तरह भावनात्मक तरीके से जुड़ने लगते हैं, की हम अपने असली अस्तित्व को ही भूल जाते हैं।
दरअसल हम मोह माया और भावनाएं बना लेते हैं, इन साडी चीजों के साथ रहते रहते। क्या आप जानते हैं की किसी भी इन्सान में भावनाएं क्या योगदान अदा करती हैं ?
भावनाएं इन्सान को इन्सान बनाये रखती हैं, उसी समय ये भावनाएं इन्सान के रास्ते की सबसे बड़ी अड़चन होती हैं।
इस लिए निराकरद ये है की, इन्सान में भावनाएं मूलतः इंसानों क ही वजह से बनता है, जिसके इर्द गिर्द रहते हैं वो। अतः हमे बहुत सोच समाज के किसी भी व्यक्ति से नाता बनाना चाहिये, ताकि हमारे आदर जिस भावना का अविष्कार हो वो हमें रूकावट न दे बल्कि सहयोगी हो हमे हमारे लक्ष्य तक जाने में।
निक्शल और पवित्र रिश्ते और नाते ऐसा करने में सहयोगी होते हैं।
माँ बाप, भाई बहिन और परम मित्रों के साथ बने रिश्ते ऐसा मार्ग प्रसस्थ करते हैं।
व्यावासिक स्तर पर हर एक रिश्ता लाजमी है परन्तु निकटतम रिश्ते बहुत सोच समाज कर बनने चाहिये.
Thursday, August 13, 2009
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Suljhe hue khayalat hain!
ReplyDeleteAazadee mubarak ho..ham rahe na rahen,ye amar rahe!
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प्रिय मित्र,
ReplyDeleteजश्ने-आजादी की बहुत-बहुत शुभकामनाएं. आज़ादी मुबारक हो.
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उल्टा तीर पर पूरे अगस्त भर आज़ादी का जश्न "एक चिट्ठी देश के नाम लिखकर" मनाइए- बस इस अगस्त तक. आपकी चिट्ठी २९ अगस्त ०९ तक हमें आपकी तस्वीर व संक्षिप्त परिचय के साथ भेज दीजिये.
आभार.
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अमित के सागर