आज कल भावनाएं, बिकती हैं बाज़ार में;
कीमत होती है झूटी मुस्कराहट, किसी काफ़ी शॉप पर
आज मुलाकात हुई थी मेरी एक अजनबी से
जो अपनी भावनाएं बेचने को तैयार था
मै शायद खरीद भी लेता
पर मेरा इमां ही बीमार था।
टटोलता रहा मैं ख़ुद को, उसकी भावना भी देखीं
शायद जो कुछ उपहारों और बार पर कुर्बान था;
हमे भी देखना था, कुछ समजना भी था हमें
मै बढ़ा,
किसी काफ़ी शॉप की तरफ़, उनके साथ हो कर
.........
दिन गुजरता गया...और शाम हुई
मुझे मिल नही पाई शायद, जिसकी हमे तालास थी
....
भावना तो थी ही नही उसमे,
सूख सी गई थी शायद,
एक अक्स सा बचा था कहीं,
कृतिमता साफ़ झलक रही थी.
Saturday, August 15, 2009
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