मैंने इश्क का एक चेहरा यूँ देखा
ख़ुद से ख़ुद को जुदा होते देखा
कुछ समज में नही आ रहा था मेरे
की मैंने ख्वाब देखा या हकीकत देखा
एक सक्श से मुहब्बत थी हमें
एक सक्श की इबादत की हमने
दिन रात बस उसी में लगा रहा
ख़ुद को बस कुर्बान करता रहा
एक दिन आया, जब वो किसी और की हो गई
हमे अकेला छोर गई
बहुत रोया, नही सोया
बहुत तडपा, उसने सब कुछ था हड़पा
चीखा चिल्लाया
कुछ हाथ में न आया
फिर बैठ गया मै
सब कुछ छोड़ कर
ये मन कर की मैंने
जो कुछ देखा
वो एक ख्वाब था
एक एहसास था।
Thursday, August 13, 2009
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment