उमर कच्ची होती है, और ललक भी बहुत सच्ची होती है,
दो लोग एक दूजे के नज़दीक आते हैं,
इश्क का प्यारा चिराग जलाते हैं,
बहुत; मिलने मन करता है,
न भूख लगती है, न प्यास होती है,
बस एक दूजे को दिन रात देखने की आस होती है,
स्कूल के दिन हो या जमाना कॉलेज का,
एक दूजे से छिप-छिप के मिले की आस होती है,
माँ-बाप कुछ कहें, ठीक नही लगता
बस तुम होती/होते हो
दिल को आस मिलती है,
नीद का न आना, भूक का न लगना;
ये बस शुरू के लक्षण हैं
जब सब कुछ अंत हो जाए,
तब इश्क की असली शुरुआत होती है।
Thursday, August 6, 2009
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